तेरी जानिब से जब भी सवाल उठे,
कुछ लाजिम थे, कुछ बेख्याल उठे,
परदा गिरा , जो कई मुलाकातों के बाद,
दबे थे जों दिल में , शायद वो मलाल उठे,
और एहतियातन कम ही मिलता हूँ मैं उससे,
फ़िर नजाने क्यों मेरी मोहब्बत पर सवाल उठे,
वो फ़िर जा बैठा है, रकीबों में "अज़ल",
शायद फ़िर सोचकर, एक नई चल उठे,
Monday, December 14, 2009
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