कुछ लाजिम थे कुछ बे ख्याल उठे,
अह्तियातन कम ही मिलता हूँ मैं उससे,
फ़िर नजाने क्यों मेरी मोहब्बत पर सवाल उठे,
और वो फ़िर जा बेठा है रकीबों में "अज़ल" ,
शायद फ़िर सोचकर एक नई चाल उठे,
फ़िर नजाने क्यों मेरी मोहब्बत पर सवाल उठे,
और वो फ़िर जा बेठा है रकीबों में "अज़ल" ,
शायद फ़िर सोचकर एक नई चाल उठे,